उत्तर प्रदेश

सपा-कांग्रेस का गठबंधन भाजपा की उडी नींद, देखें क्या कहते हैं आंकड़े

2012 के चुनाव में सहारनपुर की नकुड़ सीट पर 84,498 वोट लेकर भी कांग्रेस के इमरान मसूद, बसपा के धर्मसिंह सैनी से चार हजार से ज्यादा वोटों से हार गए थे। यहां सपा के फिरोज आफताब को 29 हजार से अधिक मत मिले थे। यदि उनके वोट जोड़ दिए जाएं तो इमरान बड़े अंतर से चुनाव जीत जाते।
यह स्थिति अकेले नकुड़ नहीं, सहारनपुर जिले की नगर, सहारनपुर, रामपुर मनिहारन समेत अधिकतर सीटों पर थी। सहारनपुर ही क्यों, प्रदेश में ऐसी सीटों की संख्या दो दर्जन से ज्यादा है, जहां सपा और कांग्रेस के वोट मिलकर चुनाव का नतीजा बदल सकते थे।

मौजूदा चुनाव में सपा और कांग्रेस का गठबंधन वोटों के इसी गणित को ध्यान में रखकर किया गया है। राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि दोनों दलों के वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर हो जाएं तो चुनाव में चौंकाने वाले परिणाम आ सकते हैं। हालांकि उनका कहना है कि गठबंधन तभी लाभदायक होता है जब जमीनी स्तर पर इसका माहौल बना हो।

कांग्रेस-सपा गठबंधन की दो है प्रमुख वजहें

सपा ने 2012 के विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी लेकिन 2017 आते-आते उसे गठबंधन की जरूरत महसूस होने लगी। सपा ने कांग्रेस को गठबंधन में लगभग 100 सीटें दी हैं। इस गठबंधन की दो प्रमुख वजह मानी जा रही है।

पहली, 19 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोटों को सहेजने की कोशिश, जिन पर मायावती मजबूती से दावा जता रही हैं। दो सेकुलर दलों की दोस्ती से मुसलमानों में यह विश्वास पैदा करने की कोशिश की गई है कि वे ही प्रदेश में भाजपा का विकल्प हैं। दूसरी, एक-दूसरे के वोटों को ट्रांसफर कराकर सीटों की संख्या बढ़ाना।

कांग्रेस को 2012 के विधानसभा चुनाव में 29.15 प्रतिशत और कांग्रेस को 11.63 फीसदी वोट मिले थे। यदि इनके वोट जोड़ दिए जाएं तो 40.78 प्रतिशत बैठते हैं। 2017 के चुनाव में इस वोट बैंक में कुछ कमी आए तो भी सत्ता का रास्ता नहीं रुकेगा।

प्रदेश में पिछली कई सरकारें 30 प्रतिशत के आसपास वोट लेकर बनी हैं। वोट बैंक में एक से डेढ़ प्रतिशत की कमी या बढ़ोतरी सीटों में बड़ा अंतर पैदा कर देती है। गठबंधन से इस वोट बैंक को बढ़ाया जा सकता है।

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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