उत्तर प्रदेश

मुगलसराय स्टेशन: नए नाम पर बटी राय, प्रदर्शन

दीनदयाल उपाध्याय या लाल बहादुर शास्त्री? वाराणसी के पास स्थित मुगलसराय स्टेशन का नया नाम इन दो खास नामों के बीच अटक गया है। मंगलवार को योगी सरकार की कैबिनेट ने मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलकर दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर रखने का फैसला किया था, लेकिन बुधवार को कुछ लोगों ने इस नाम पर आपत्ति जताई और स्टेशन का नाम पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नाम पर रखे जाने की मांग की।

1968 में आरएसएस-बीजेपी के विचारक दीनदयाल उपाध्याय का शव मुगलसराय स्टेशन पर संदिग्ध हालत में पाया गया था, वहीं यह शहर पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्मस्थल है। आरएसएस और संघ परिवार से जुड़े अन्य संगठन दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर ही मुगलसराय स्टेशन का नाम चाहते हैं, जबकि दूसरा ग्रुप पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नाम पर रखे जाने के पक्ष में है।

बुधवार को मुगलसराय के शास्त्री पार्क में शहर के कांग्रेस कमिटी अध्यक्ष रामजी गुप्ता और शास्त्री जन्मस्थली सेवा न्यास के संयोजक कृष्ण गुप्ता की अगुवाई में लोग इकट्ठा हुए। ये लोग योगी सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे। लोगों ने मुख्यमंत्री योगी का पुतला फूंकने का भी प्रयास किया, लेकिन पुलिस के हस्तक्षेप से उनकी योजना को नाकाम हो गई।

रामजी ने कहा कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को इस बारे में जानकारी दे दी गई है और वह तब तक प्रदर्शन करते रहेंगे जब तक यूपी कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष वहां नहीं पहुंच जाते।

सोमवार को मुगलसराय निगम बोर्ड के विशेष सत्र में समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और इंडिपेंडेंट पार्षदों ने मुगलसराय का नाम बदलकर दीनदयाल उपाध्याय नगर किए जाने के प्रस्ताव पर विरोध जताया था। कई संगठन वर्षों से मुगलसराय में शास्त्री स्मारक की मांग कर रहे हैं, जबकि आरएसएस और संघ से जुड़े अन्य संगठन 1970 से मुगलसराय को दीनदयाल उपाध्याय नगर के रूप में संदर्भित कर हे हैं। यब बात उनके रिकॉर्ड और दस्तावेज बताते हैं।

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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