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हम समाजवादी हैं, हम अपनी जुबां से नहीं बदलते।‘ लेकिन हैरानी यह है कि नेताजी इस वक्त हर रोज अपने बदलते बयानों की वजह से चर्चा में हैं:यूपी चुनाव

सैय्यद मौहम्मद मरगूब हुसैन ज़ैदी ( प्रबन्ध संपादक)  मुलायम सिंह यादव जनसभाओं में एक बात कहना नहीं भूलते रहे हैं, वह यह है कि- ‘हम समाजवादी हैं, हम अपनी जुबां से नहीं बदलते।‘ लेकिन हैरानी यह है कि नेताजी इस वक्त हर रोज अपने बदलते बयानों की वजह से चर्चा में हैं और उनके इस व्यवहार से इस कद्दावर नेता की साख पर अब सवालिया निशान उठाने लगे हैं। उनके हालिया बयानों पर जरा गौर कीजिए…

20 जनवरी : मेरा आशीर्वाद अखिलेश के साथ है, जितना बढ़िया कर सकता था, उसने किया। कहीं उसका कोई विरोध नहीं है।
29 जनवरी: 12 तारीख से अखिलेश के लिए प्रचार करूंगा। सब कुछ दे दिया उसे, आखिर बेटा है मेरा।
29 जनवरी : फ्लाइट से उतरकर घर पहुंचने के दरम्यान ही वह बदल गए। घर पहुंचकर उन्होंने मीडिया से कहा- गठबंधन का मैं विरोध करता हूं। पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी इसका विरोध करें। मैं प्रचार भी नहीं करूंगा।
1 फरवरी : जब गठबंधन हुआ है तो प्रचार भी करूंगा।

कौन लिख रहा है स्क्रिप्ट
राजनीतिक गलियारों में इस वक्त एक संयोग के जरिये बड़ा सवाल उठ रहा है। संयोग यह है कि ‘नेताजी’ मीडिया से औपचारिक रूप से बात करते हैं तो उनके हाथ में एक लिखित बयान होता है और वह उसी बयान को पढ़ते हैं। यह बयान हमेशा ‘ऐंटी अखिलेश’ होता है लेकिन जब वह अनौपचारिक रूप से मीडिया के सामने या किसी इंटरव्यू में (जहां उनके हाथ में कोई लिखित बयान नहीं होता) वह अखिलेश की तारीफ करते हुए दिखते हैं। ऊपर जो चार उदाहरण दिए गए हैं, उनमें से दो में जिसमें उन्होंने अखिलेश की तारीफ की है- वह ऐसे ही मौके थे, जिसमें मुलायम सिंह यादव के पास कोई लिखित बयान नहीं था। बाकी दोनों मौकों पर उनके हाथ में लिखित बयान था। इसी वजह से सवाल उठा कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो मुलायम सिंह को अपने शब्द बुलवाने को बाध्य कर रहा है? लेकिन इस सवाल से बड़ा सवाल यह है कि मुलायम सिंह यादव जैसे अनुभवी और कद्दावर नेता की ऐसा क्या मजबूरी हो सकती है कि जो किसी के शब्दों को अपनी आवाज दें?

तो क्या छटपटाहट है
कहा यह भी जा रहा है कि बार-बार बदलते बोलों के पीछे मुलायम सिंह यादव की छटपटाहट है। जिस व्यक्ति की सांसों में राजनीति बसी हो, उसको उसकी ही पार्टी के फैसलों से शामिल न किया जा रहा हो, तो उसकी क्या मनोस्थिति होगी, इसे आसानी से समझा जा सकता है। मुलायम सिंह यादव की यादव की राजनीति उस वक्त शुरू हुई थी, जब कांग्रेस का दबदबा था। उन्होंने अपनी राजनीतिक पूंजी कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई लड़कर तैयार की है। सूबे में समाजवादी पार्टी मजबूत तभी हुई है जब कांग्रेस खत्म हुई। इसीलिए मुलायम सिंह यादव कभी कांग्रेस को ऑक्सिजन देने के पक्षधर नहीं रहे। यह पहला मौका नहीं है। राममंदिर आंदोलन के उभार के वक्त और फिर 92 में अयोध्या कांड के बाद भी बीजेपी को रोकने के लिए सभी सेक्युलर दलों को एक होने पर बहुत चर्चा हुई थी लेकिन मुलायम ने कांग्रेस से गठबंधन करने से मना कर दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त भी महागठबंधन पर बात हुई थी लेकिन मुलायम तैयार नहीं हुए। उनका मानना रहा है कि अगर एक बार कांग्रेस मजबूत हुई तो वह समाजवादी पार्टी के लिए खतरा बनेगी। ऐसे में गठबंधन जैसे इतने बड़े फैसले पर भी अखिलेश ने उनकी राय लेनी जरूरी नहीं समझी। कांग्रेस के नेताओं ने भी उन्हें तवज्जो नहीं दी।

यह हो सकती है वजह
कहते हैं कि मुलायम इसी छटपटाहट और गुस्से में गठबंधन के खिलाफ बयान देते हैं, पार्टी के नेताओं से इसके विरोध में आवाज उठाने को कहते हैं, प्रचार में न जाने की बात कहते हैं लेकिन उन्हें पार्टी के अंदर से कहीं कोई समर्थन नहीं मिलता। यहां तक परिवार में उनकी छोटी बहू अपर्णा यादव और भाई शिवपाल यादव भी गठबंधन के उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में हैं। ऐसे में मुलायम सिंह यादव के लिए अपने बोल बदलना मजबूरी हो जाती है।

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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