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गाजीपुर-सिंघु बॉर्डर लाए जाएंगे किसानों के अस्थि कलश

सिमरन खान विशेष संवाददाता दिल्ली
लखीमपुर खीरी के तिकुनिया में अंतिम अरदास स्थल पर बैठे किसान नेता राकेश टिकैत, योगेंद्र यादव और राजवीर सिंह जादौन।

यूपी में लखीमपुर जिले के तिकुनिया से शुरू हुई अस्थि कलश यात्रा पूरे देश में जाएगी। मंगलवार को अंतिम अरदास स्थल से यह यात्रा शुरू हो गई है। जो अस्थि कलश बचे रह गए हैं, वे दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर और सिंघु बॉर्डर पर लाए जाएंगे। यहां से उन्हें राज्य और जनपदवार भेजा जाएगा। कलश यात्रा का स्वरूप कैसा होगा, इस पर ‘दैनिक भास्कर’ ने भारतीय किसान यूनियन के उप्र अध्यक्ष राजवीर सिंह जादौन से विशेष बातचीत की।
पुलिस ने किसानों को रोका, इसलिए वे नहीं पहुंच पाए
राजवीर जादौन ने बताया कि मंगलवार को अंतिम अरदास स्थल पर सभी राज्यों के लिए एक-एक और उत्तर प्रदेश के लिए 75 अस्थि कलश बनाकर तैयार किए गए थे। हमारे तमाम किसानों व प्रमुख नेताओं को पुलिस ने जहां-तहां रोक लिया, इस वजह से वे अंतिम अरदास स्थल पर पहुंच नहीं पाए। अंतिम अरदास स्थल से आठ राज्यों और यूपी के करीब 10 मंडलों को अस्थि कलश जा पाए हैं।
बचे रह गए 35 अस्थि कलश मोर्चों पर आएंगे
राजवीर जादौन ने आगे बताया कि अभी करीब 35 अस्थि कलश बचे रह गए हैं। इन्हें 14 अक्तूबर की शाम तक दिल्ली लाया जाएगा। यूपी के अस्थि कलश गाजीपुर बॉर्डर और बाकी राज्यों के अस्थि कलश सिंघु बॉर्डर पर रखे जाएंगे। यहां से उन्हें संबंधित जनपद-राज्यों के लिए भेजा जाएगा।
नेपाल बॉर्डर के नजदीक था अरदास स्थल
प्रदेश अध्यक्ष ने यह भी माना कि तिकुनिया में अंतिम अरदास स्थल लखीमपुर खीरी जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर था। गांव-देहात और नेपाल बॉर्डर नजदीक होने की वजह से तमाम राज्यों व जिलों के किसान वहां नहीं पहुंच पाए। उनकी सुविधा के लिए बचे हुए अस्थि कलशों को दिल्ली के बॉर्डरों पर लाने का फैसला लिया गया है।

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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