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इस शख्स को सिर्फ 11 रुपये फीस दीजिए, तय मानिए एक दिन आपका बच्चा IAS बनेगा

“बिहार में जहां आनंद कुमार गरीब बच्चों को आइआइटियन बना रहे तो गुरु रहमान सिर्फ 11 रुपये फीस में आइएएस और आइपीएस। मिलिए इस बेमिसाल गुरु से।”

2002 की बात है। एक लड़का आता है पटना के गुरु रहमान के पास। कहता है- सर, मेरे पापा इस दुनिया में नहीं हैं। दो जून की रोटी किसी तरह से परिवार को नसीब होती है। कोचिंग करने के पैसे नहीं है। क्या आप कॉम्पटीशन की तैयारी में कुछ गाइडेंस दे सकते हैं।  मुझे पता है कि आप कई कॉम्पटीशन देकर सफल हो चुके हैं, इस नाते आप बेहतर मार्गदर्शन कर सकते हैं।

सादिक आलम नामके इस छात्र ने जब  कुछ इस तरह विनती की तो रहमान को लगा कि इस लड़के का मार्गदर्शन जरूर करना चाहिए। क्योंकि बातचीत से ही लग रहा कि लड़का बहुत मेधावी है।  रहमान ने कहा कि-तुम सिर्फ 11 रुपये की फीस दो, हम सिविल सर्विसेज की पूरी कोचिंग देंगे। रहमान ने छात्र को गाइडेंस देनी शुरू कर दी। और बाद में वही लड़का आइएएस बन गया। आज सादिकेआलम नामक वह लड़का आज ओडिशा के नौपाड़ा जिले का डीएम है।

जी हां, बात हो रही है, उस गुरु रहमान की, जो कि सादिकेआलम जैसे तमाम गरीब बच्चों को महज 11 रुपये फीस लेकर अफसर बनाने का मिशन चला रखे हैं। रहमान पहले बातचीच करते हैं। अगर लड़का मेधावी है और वाकई में घऱ की माली हालत खराब मिलती है तो उसे क्षमता के हिसाब से सिर्फ 11 से सौ रुपये फीस देने को ही  कहते हैं।

रहमान कहते हैं कि बातचीत से ही लग जाता है कि कौन लड़का मेधावी है और कम फीस में कोचिंग का जरूरतमंद है। अब तक उन्हें किसी विद्यार्थी ने गुमराह नहीं किया है। जो छात्र किसी प्रतियोगी परीक्षा में सफल होकल निकलते हैं तो वे बाद में कोचिंग को आर्थिक सहयोग खुशी-खुशी देते हैं।

इतने आइएएस और आइपीएस बना दिए-

बिहार के पुर्णिया जिले की रहने वालीं मीनू कुमारी की भी भेंट रहमान से हुई। माली हालत अच्छी न होने के कारण रहमान ने उनसे भी सिर्फ 11 रपये की फीस ली। और आज मीनू कुमारी भी आईपीएस हैं। गुरु रहमान क्लासेज से पढ़कर अब तक 60 छात्र-छात्राएं आइपीएस बन चुके हैं तो पांच स्टूडेंट आईएएस। इसमें सभी की पारिवारिक हालत खराब रही। जिन्हें महज 11 से सौ रुपये की फीस में ही रहमान ने कोचिंग देकर अफसर बना दिया। रहमान की कोचिंग से ही पढ़कर 2010 में संजीव कुमार आइएएस हुए। इनका परिवार दाने-दाने को मोहताज था। मगर रहमान के संपर्क में आते ही किस्मत बदल गई।  2009 में रहमान के शिष्य गुड्डू कुमार आइआरएस बने।

यूं हुई कोचिंग की शुरुआत

वर्ष 1994 का वक्त। रहमान कहते हैं कि पुलिस इंस्पेक्टर का बेटा होने के कारण वह आइपीएस बनना चाहते थे। कई प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठे। सफल भी हुए। मगर उन्होंने प्रतियोगी छात्रों को कोचिंग देनी शुरू की।  उस वक्त बिहार में चार हजार सब इंस्पेक्टर्स पदों की भर्ती के लिए विज्ञापन निकला था। जब रिजल्ट आया तो रहमान स्टार बन गए। वजह कि उनकी कोचिंग से पढ़े 1100 छात्रों ने प्रतियोगी परीक्षा में बाजी मारते हुए सब इंस्पेक्टर्स हो गए।

जाहिर सी बात है कि चार हजार मे से किसी कोचिंग के 1100 लड़के अगर सलेक्ट होंगे तो नेम-फेम चमकना लाजिमी है। पहले मध्यम दर्जे की प्रतियोगी परीक्षाओं की ही रहमान तैयारी करते रहे। मगर जब गाइडेंस लेकर  2002 में छात्र सादिकेआलम आइएएस बन गए तो रहमान के पास खुशी का ठिकाना नहीं रहा। फिर रहमान ने सिविल सर्विस की कोचिंग भी देनी शुरू कर दी। पटना के गोपाल मार्केट स्थित रहमान की कोचिंग अदम्य अदिति गुरुकुल में इस वक्त दो हजार से ज्यादा छात्र यूपीएसससी, एसससी, बीपीएससी व अन्य क्लर्किल जॉब्स की कोचिंग ले रहे हैं।

रहमान की लवस्टोरी है फिल्मी

जब रहमान ने बीएचयू में प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति विषय से टॉप किया तो साथ पढ़ने वालीं अमिता प्रभावित हुईं। दोनों एक दूसरे से मिलना शुरू किए। दोस्ती कुछ समय बाद में प्यार में बदल गई। रहमान कहते हैं कि वह वक्त कुछ और था। हिंदू-मुस्लिम लड़की और लड़के की शादी होना रेत से तेल निकालने जैसा था। रहमान कहते हैं कि हमने शादी करने का फैसला लिया तो परिवार वाले विरोध पर उतर आए। परिवार को नजरअंदाज कर हमने मंदिर में शादी रचाई। इस पर हम दोनों को सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा। रहमान कहते हैं कि हमने तय किया था कि शादी के बाद भी हममें से कोई धर्म बदलने को मजबूर नहीं होगा। आज हमारे दोनों बच्चों के हिंदू नाम हैं-अदम्य अदिति और अभिज्ञान अरिजित है।

सामाजिक जागरूकता भी फैला रहे रहमान के स्टूडेंट

प्राचीन इतिहास, मॉर्डन हिस्ट्री और ग्रामीण विकास विषय में एमए रहमान कुमार दो विषयों से पीएचडी हैं। फिलहाल कोचिंग में दो हजार विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। खास बात है कि इतनी बड़ी टीम के साथ रहमान सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम भी करते हैं। ताकि समाज का भी भला हो सके।

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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