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नसीमुद्दीन सिद्दीकी को बसपा से निकाले जाने के ये हैं पांच बड़े कारण

सैय्यद मौहम्मद मरगूब हुसैन ज़ैदी (प्रबन्ध संपादक) नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर गंभीर आरोप लगाकर बसपा सुप्रीमो मायावती ने बुधवार को पार्टी से निकाल दिया गया। अभी तक मायावती के मुख्य ‘हथियार’ रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी अब बसपा के इतिहास हो गए हैं। गंभीर आरोप लगाकर नसीमुद्दीन सिद्दीको को बेटे सहित पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। यूपी विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद से नसीमुद्दीन सिद्दीकी से बसपा सुप्रीमो नाराज चल रही थीं। आइए जानते हैं और क्या कारण थे, जिनके चलते मायावती ने नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी से बाहर की राह दिखाई…

1.पहले ही तय हो गया था निष्कासन

सूत्रों की मानें तो नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी को निकालने की स्क्रिप्ट 14 अप्रैल को लिख गई थी। जब वह अम्बेडकर जयंती के मौके पर अपेक्षित भीड़ नहीं ला पाए थे। इससे नाराज मायावती ने अगले दिन ही नसीमुद्दीन को कोआर्डिनेटर्स के सामने ही खूब खरी-खोटी सुनाई थी। इसके बाद 21 अप्रैल को मायावती ने यूपी में उनका कद छोटा करते हुए, एक तरह से प्रदेश निकाला देते हुए उन्हें मध्य प्रदेश के चुनाव प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी थी। साथ ही उन्हें पार्टी के लिए फंड का भी जुगाड़ करना था, लेकिन नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने यूपी से बाहर जाने से मना कर दिया। इसके चलते मायावती उनसे नाराज थीं। इसके बाद कई पार्टी नसीमुद्दीन सिद्दीकी को बुलावा भेजा गया, लेकिन वह नहीं आए। बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने कहा कि पार्टी में किसी की अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

2.स्वाति सिंह विवाद

यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान दयाशंकर के मायावती पर दिए विवादित से बसपा को फायदा होता दिख रहा था। हर तरफ भाजपा उपाध्यक्ष दयाशंकर के बयान की निंदा हो रही थी। मामले को लेकर संसद में भाजपा नेता अरुण जेटली को भी सफाई देनी पड़ी थी। इस प्रकरण के बाद भाजपा पूरी तरह से बैकफुट पर दिख रही थी। लेकिन तभी नसीमुद्दीन के एक कथित विवादित बयान से माहौल भाजपा के पक्ष में बनने लगा और एक नई राजनीतिक हस्ती (स्वाति सिंह) का उदय हुआ। जिसने न सिर्फ मायावती के खिलाफ मोर्चा खोला, बल्कि पहली बार विधायक (सरोजनीनगर) भी बनी।

3.मुस्लिमपरस्ती के ठप्पे से छुटकारा

राजनीतिक जानकारों की मानें तो नसीमुद्दीन सिद्दीकी का पार्टी से निष्कासन बसपा पर चुनाव के दौरान लगे मुस्लिमसरपरस्ती को आरोपों से छुटाकारा पाने की कोशिश का भी एक हिस्सा है। यूपी चुनाव में शिकस्त के बाद बसपा की समीक्षा बैठक में यह बातें सामने आ रही थीं कि पार्टी को मुस्लिम केंद्रित होकर चुनाव लड़ने से खासा नुकसान हुआ है। गौरतलब है कि यूपी चुनाव में मुस्लिमों की आबादी से ज्यादा एक चौथाई टिकट (100) मुस्लिम प्रत्याशियों को देने में अहम भूमिका नसीमु्द्दीन सिद्दीकी की ही थी। उन्हें पार्टी से बाहर किए जाने का एक प्रमुख कारण यह भी माना जा रहा है।

4.भाई को मजबूती देने की कोशिश

इन तमाम कारणों के अलावा मायावती के इस कदम को भाई को पार्टी में मजबूती देने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। अभी तक बसपा में नसीमुद्दीन सिद्दीकी नंबर दो की हैसियत के नेता माने जाते रहे हैं। न सिर्फ पार्टी के मूल संगठन में उनकी भूमिका अहम थी, बल्कि बहुजन वालंटियर का नियंत्रण भी लगभग उनके हाथ में था। चुनाव में हार के बाद बसपा सुप्रीमो उनका कद छोटा करना चाहती थीं, लेकिन पार्टी का एकमात्र मुस्लिम चेहरा होने का कारण उन्हें साइडलाइन करना आसान नहीं था। इसलिए मायावती ने पहले उन्हें मध्य प्रदेश भेजने की कोशिश की जब वह नहीं मानें तो मजबूरन उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया। नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बाहर होते ही आनंद कुमार सीधे तौर पर पार्टी में मायावती के बाद ताकत के दूसरे केंद्र हो गए हैं।

5.नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर गंभीर आरोप

नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर चुनाव के दौरान टिकट के बदले पैसे लेने और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का गंभीर आरोप हैं। बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर आरोप लगाते हुए कहा उन्होंने चुनाव के दौरान लोगों से पैसा लिया था। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी का पूरी तरह से निर्वहन नहीं किया। मिश्र ने कहा कि नसीमु्द्दीन सिद्दीकी के पास पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई बेनामी संपत्ति है। इसके अलावा कई स्लाटर हाउस में उनकी साझेदारी भी है।

 

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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