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महात्मा हजारीलाल मेमोरियल ट्रस्ट के राष्ट्रिय अध्यक्ष श्री अनुज शर्मा जी का दिल्ली सरकार को निवेदन पत्र

खुला पत्र दिल्ली के मुख्यमंत्री के नाम
सेवा मे,
श्रीमान अरविंद केजरीवाल जी
मुख्यमंत्री:- दिल्ली सरकार

माननीय मुख्यमंत्री जी मे आप को कुछ सुक्षाव दे रहा हूँ जिससे आप दिल्ली मे बढते कोरोना को रोकने हेतु ठोस से ठोस नियम बनाये और और दिल्ली को सुरक्षित करे।

मे आपको अपने संघटन के माध्यम से कुछ सुक्षाव दे रहा हूँ । और आप से उम्मीद करता हूँ की दिल्ली को सुरक्षित करने हेतु आप इन सुझावों पर जरुर अमल करेगे।

सबसे पहले तो ये जरूरी है कि दिल्ली की जनता मे यह संदेश जाना चाहिए । कि दिल्ली के मुख्यमंत्री उनके लिए कुछ बेहतर कर सकते हैं।

इसलिए आपको कोई भी नियम बनाने में पीछे नहीं हटना चाहिए इसलिए आप किसी भी मुद्दे पर जरूरी तुरंत निर्णय लें।
बिना सोचे कि दूसरे राज्यों ने क्या किया है और क्या नहीं क्योंकि अगर दिल्ली में केस बढ़ रहे हैं तो दिल्ली में उत्तराखंड वाली छूट नहीं दी जा सकती ।

प्रत्येक राज्य की अपनी-अपनी समस्याएं हैं और अब मेरे आपको कुछ महत्वपूर्ण सुझाव है जो इस प्रकार से हैं:-

(1) दिल्ली में सभी मार्केट अगर आपने खोलने का निर्णय ले ही लिया है तो भी आप कुछ नियम अपनाए जैसे अगर सब कुछ खुल जाएगा तो उन सभी जगहों पर भीड़ होगी इसलिए भीड़ कम हो इसके लिए दुकानों को खोलने का नियम बनाए जाए ।

जैसे:- दूध की दुकानें, सब्जी की दुकान, जर्नल स्टोर, राशन की दुकानों का समय निर्धारित किया जाए ।

सुबह 6:00 बजे से दोपहर 3:00 बजे तक ही होना चाहिए ।

(2) बाकी सभी दुकानें सुबह 11:00 बजे से रात्रि 8:00 बजे तक खुलने और बंद होने का नियम बने।

यह बहुत जरूरी है इससे सोशल डिस्टेंस ही नहीं बनेगा बल्कि दिल्ली वालों को भी लगेगा कि दिल्ली सरकार लोगों के लिए कुछ सोच रही है और यह नियम बना रही है भीड़ भी मार्केट में कम रहेगी लोगों के ऑफिस जाने और दुकाने के खुलने का समय और उसमें कार्य करने वालों के समय में भी अंतर होगा।

(3) अगर आप ऑड और इवन (ODD- EVEN) नियम लागू नहीं कर सकते तो कुछ अलग से जैसे ऑटो टैक्सी को सुबह 9:00 बजे से रात्रि 9:00 बजे तक ही चलने का नियम बनाएं । ताकि 10 से 12 घंटे का गैप मिल सके और यह गाड़ियां सैनिटाइजर हो सके ।

जो रात्रि सेवा देना चाहते हैं वह केवल रात्रि 9:00 बजे से सुबह के 10:00 बजे तक ही चल सकते हैं ।

उनको अलग से स्टीकर दिया जाए यह नियम 2 महीने अपनाया जाए इसे रात्रि सेवा देने वाले कुछ प्रतिशत की गाड़ियां चलेंगी और दिल्ली में गाड़ियों की कमी भी नहीं होगी इस प्रकार का नियम बहुत जरूरी है गाड़ियों को सैनिटाइजर होने के लिए

(4) सभी ऑफिस और फैक्ट्री में 50 % ऑफिस स्टाफ के साथ कार्य होना चाहिए।
इससे उन लोगों पर दबाव नहीं पड़ेगा जो दिल्ली से बाहर अपने शहर जा रखे हैं और वह फ़िलहाल वही रहेंगे ।

जैसे बीपीओ (BPO) सेक्टर में सैकड़ों लोग एक साथ वर्क करते हैं अगर नियम ही होगा 50 % तो ऑफिस हेड की तरफ से दबाव नहीं पड़ेगा ऑफिस अपनी तरफ से खुद ही लोगों को छुट्टी दे देगा ।

कोई भी ऑफिस वाला इतना परेशान नहीं होता कि वह 3 से 4 महीने अपना किराया और खाने का बंदोबस्त नहीं कर सकता है बल्कि जिसको जरूरत होगी वहीं ऑफिस जाएगा ।

(5) स्कूल, कॉलेज, इंस्टीट्यूट, यह सब सितंबर में ही खुलेंगे इस बात को लेकर चले मीडिया में भी इस बात को आप रख सकते हैं । कि यह सब अगस्त सितंबर मे हीं खुलेंगे ।

अगर आपने यह सब कर दिया तो अब दिल्ली को कोरोना मुक्त कर सकते हैं ।

तो काफी लोगों को कोरोना अनुभव हो चुका होगा ठीक हो चुके होंगे । इससे लोगों में यह संदेश जाएगा कि इतनी बड़ी बात नहीं है ।
क्योंकि करोना वायरल से लोगों के अंदर से डर निकल चुका होगा ।
और फिर आप फिर आसानी से दिल्ली को खोल सकते हैं और हो सकता है तब तक कोई दवाई बन जाए ।

दिल्ली में बहुत कम होगा तो लोग भी खुद ही जागरूक होंगे की बड़ी बात नहीं है ।

इसलिए मुख्यमंत्री जी मेरे इन सुझावों पर आप कार्य करें।

अभी बहुत जरूरी है कि दिल्ली सुरक्षित रहे ।

दुकानों को खुलने के समय पर जरूर ध्यान दें नहीं तो कोरोना दिन प्रतिदिन बढ़ेगा

अनुज शर्मा
राष्ट्रीय अध्यक्ष
महात्मा हजारीलाल मेमोरियल ट्रस्ट

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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