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जमीअत उलमा ए हिन्द के अध्यक्ष हज़रत मौलाना कारी मोहम्मद उस्मान मंसूरपुरी के नेतृत्व में धार्मिक नेताओं, शिक्षाविदों और अन्य सामाजिक बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आज उनके निवास 7 /रेस कोर्स पर नई दिल्ली पहुंचकर मुलाकात की,

दिल्ली:जमीअत उलमा ए हिन्द के अध्यक्ष हज़रत मौलाना कारी मोहम्मद उस्मान मंसूरपुरी के नेतृत्व में धार्मिक नेताओं, शिक्षाविदों और अन्य सामाजिक बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आज उनके निवास 7 /रेस कोर्स पर नई दिल्ली पहुंचकर मुलाकात की, यह बैठक लगभग दो घंटे तक चली। इस अवसर पर प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री को एक मेमोरेंडम भी पेश किया। बैठक के बाद मीडिया के प्रतिनिधियों से बात करते हुए जमीअत उलमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना कारी मोहम्मद उस्मान मंसूरपुरी और महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने संयुक्त रूप से कहा कि हमारी बैठक सकारात्मक और संतोष जनक रही और प्रधानमंत्री ने हमारे सभी चिंताओं से सहमत जताई. मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि तलाक के विषय पर भी उन्होंने हमारी राय से सहमत हुए कहा कि यह मुस्लिम समाज का आंतरिक मामला है, उसे खुद ही इसे हल करना चाहिए, मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि बैठक से हमारा उद्देश्य आपसी संपर्क का दरवाजा खोलना और एक ऐसे तंत्र को निर्धारित करना था जिसके माध्यम से हम स्थायी समस्याओं के बारे में सरकार से संपर्क रख सकें ताकि मुसलमानों की देश के विकास में योगदान और भागीदारी सुनिश्चित बनाया जा सके। मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि प्रधानमंत्री से सभी मुद्दों पर विस्तृत बातचीत हुई और लगभग हर विषय पर उन्होंने खुलकर राय रखी और आश्वासन दिया कि असामाजिक तत्वों के खिलाफ वह व्यक्तिगत रूप से गंभीर हैं और इसे पनपने नहीं देंगे। मौलाना मदनी ने कहा कि बैठक जरूरत और आवश्यकताओं के अनुसार हुई है, अब हम उम्मीद करते हैं कि प्रधानमंत्री ने जितने सकारात्मक विचार व्यक्त किया है, उतना ही बेहतर अच्छा कदम उठा कर स्थिति को सही करेंगे। इस अवसर पर जो ज्ञापन पेश किया गया है, उसका पाठ निचे दिया जा रहा हैं

माननीय प्रधानमंत्री जनाब नरेन्द्र मोदी जी के नाम पत्र

हम आपके बहुत आभारी हैं कि आपने जमीयत उलमा ए हिंद के अध्यक्ष हजरत मौलाना कारी मुहम्मद उस्मान मन्सूरपुरी के नेतृत्व में मुस्लिम नेताओं, शिक्षाविदों और अन्य सामाजिक बुद्धिजीवियों के इस प्रतिनिधि मंडल को मुलाक़ात का मौका दिया।

इस बैठक का मुख्य उद्देश्य सरकार और देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी के बीच आपसी बातचीत और समझ के लिए मार्ग प्रशस्त करना है। मान्यवर जिसे खुदआप ने ‘‘सबका साथ सबका विकास’’ और ‘मेरी सरकार, सभी की सरकार’’ के नारो ंसे उजागर करने की कोशिश की है। हमारा यह एहसास है कि देश के महत्वपूर्ण बुनियादी समस्याओं को सरकार और विभिन्न वर्गों के बीच आपसी बातचीत के माध्यम से ही हल किया जा सकता है।

मातृभूमि की सुरक्षा, देषवासियों की एकता, राश्ट्र निर्माण और विकास के लिए कानून की सर्वोच्चता सबसे महत्वपूर्ण है। कोई भी व्यक्ति या संगठन कानून से ऊपर नहीं है और कानून की निगाह में किसी तरह का भेदभाव और पक्षपात नहीं बरता जाना चाहिए। इसी पर ध्यान देते हुए आपने गऊ रक्षा के नाम से निजी सगठनों द्वारा कानून को अपने हाथ में लेने और पषु व्यापारियों पर जानलेवा हमलों की निंदा करके सही संदेश दिया था। लेकिन कानून लागू करने वाली एजेंसियों और राज्य प्रशासन की ओर से अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। हालही में गऊहत्या को निराधार बहाना बना कर मानव हत्या की घटनाएं हुई हैं जिनसे मुस्लिम और दलित समाज के कमजोर वर्गों में भय और आतंक की लहर पैदा कर दी है। हमें खतरा है कि अगर इसे सख़्ती से नहीं रोका गया तो इस से भय, निराशा और हताशा पैदा होगी जिसके परिणाम निषच्य ही नकारात्मक निकलेंगे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आतंकवाद जिसे हमारे दुश्मन लगातार बढ़ावा दे रहे हैं, वह राष्ट्रीय सुरक्षा, स्थिरता और शांतिपूर्ण वातावरण के लिए सबसे गंभीर समस्या है जिसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जाती रही। हमने हमेशा ऐसे प्रयासों की निंदा की है और अन्य धर्मों के लोगों के साथ राष्ट्रीय स्तरपर आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता और चरमपंथ के खिलाफ लगातार आंदोलन किया है। विश्व स्तर पर इस्लाम और मुसलमानोंको बदनाम करने की पृष्ठभूमि में, आपने और आपकी सरकार में इस्लाम की शांतिप्रियता और भारतीय मुसलमानों के नरम पंथी होने को स्वीकार करते हुए उन्हें हिंसक विचारधारा से अलग करके उनका मान बढ़ाया है । हम इसकी प्रषंसा करते हुए इस प्रतिबद्धता को दोहराते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत की भूमिका को अनुकरणीय बनाएंगे।

महोदय! आतंकवाद के खि़लाफ कानूनी कार्यवाही में इंसाफ के तक़ाज़ों का पूरी तरह अनुपालन होना चाहिए ताकि निर्दोष लोगों को कश्ट का शिकार न बनें।इस बारे में सरकारी एजेंसियों को विशेष रूप से सतर्कता के साथ व्यवहार करने की जरूरत है।

अन्य समुदायों की तरह मुसलमानों भी शिक्षा सम्बंधी, सामाजिक और आर्थिक समस्यांए हैं, जिनका स्थानीय प्रस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार समाधान होना चाहिए। इन समस्याओं का समाधान आपसी विश्वास और सौहार्द के वातावरण में होना चाहिए ताकि इस वजह से किसी वर्ग से धर्म के आधार पर भेदभाव न हो और न भेदभाव की भावना पैदा हो और देश के प्रति बराबर की जिम्मेदारी और भागीदारी समान रूप से सभी नागरिक महसूस करें। यही हमारे प्यारे वतन की पहचान रही है।

हम आपसे यह अनुरोध करतेहैं कि कोई एसी प्रक्रियां (मेकनिज़्म) निर्धारित किया जाय जिसके माध्यम से हम स्थायी समस्याओं के बार में अपने निर्धारित जिम्मेदारों से संपर्क रख सकें ताकि देश के विकास में मुस्लिम वर्ग के योगदान और भागीदारी को सुनिश्चित बनाया जा सके।

हम एक बार फिर आपका आभार व्यक्त करते हैं और उम्मीद करते हैं कि आपसी संपर्क और निकटता जिसका आज दरवाजा खोला गया है वह भविष्य के लिए अधिक बेहतर सहयोग व समझ का मार्ग प्रशस्त करेगी और आपसी सहयोग के माध्यम से हम देश के विकास और समस्याओं के समाधान में उचित भूमिका अदा कर सकेंगे।

प्रधानमंत्री से मुलाकात करने वाले प्रतिनिधिमंडल में निम्नलिखित हस्तियों भागीदार थीं (1) मौलाना कारी सैयद मोहम्मद उस्मान मंसूरपुरी (2) मौलाना महमूद मदनी, महासचिव जमीअत उलमा ए हिन्द (3) डॉ जहीर आई काज़ी (4) पीए इनामदार(5) प्रोफेसर अख्तरुल वासे (6) मोहम्मद अतीक (7) मौलाना मुफ्ती मोहम्मद सलमान मंसूरपुरी (8) मौलाना हसीब सिद्दीकी (9) मौलाना मुहम्मद कासिम (10) मौलाना हाफ़िज़ नदीम सिद्दीक़ी (11) मुफ्ती इफ़्तिख़ार अहमद कासमी रा (12) हाफिज पीर शब्बीर (13) मुफ्ती शमसुद्दीन बिजली ( 14) मौलाना बदरुद्दीन अजमल र (15) मौलाना मतीनुल हक़ ओसामा (16) मुफ्ती अहमद देओला गुजरात (17) शकील अहमद सैयद एडवोकेट (18) मौलाना नियाज़ अहमद फ़ारूक़ी सदस्य कार्यकारिणी (19) मौलाना अब्दुल वाहिद खत्री (20) मौलाना मोहम्मद याह्या (21) मौलाना अली हसन (22) मौलाना माज़ुद्दीन क़ासमी (23) मौलाना कारी शौकत अली (24) हाजी सैयद वाहिद हुसैन चिश्ती अंगारा शाह (25) मौलाना हकीमुद्दीन क़ासमी

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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