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मोदी जी – मतलब प्रचार के दम पर अपनी लत लगा दी

राजेश तिवारी ( विशेष संवाददाता )
बचपन में मेरे यहाँ जनरल स्टोर हुवा करता था..हमारे मोहल्ले के लोग जब वाशिंग पाउडर लेने आते थे तो हमसे कहते थे “भाई सर्फ़ दे दो”.. उनके लिए वाशिंग पाउडर का मतलब सिर्फ़ “सर्फ़” था.. क्यूंकि उस ज़माने में रेडिओ से लेकर टीवी तक सब जगह सिर्फ़ “सर्फ़” का बोलबाला था.. यही हाल टूथपेस्ट का था.. टूथपेस्ट मतलब लोग कोलगेट जानते थे बस.. उन्हें आप कोई भी ब्रांड दें, वो मांगते कोलगेट थे..
लाइफबॉय साबुन और डालडा वनस्पति घी का भी यही रुतवा था किसी जमाने में बाजार और ग्राहकों पर।
आपको क्या लगता है कि कोलगेट या सर्फ़ ने इन आम लोगों की ज़िन्दगी में कौन सा तूफ़ान ला दिया था जिसकी वजह से उनके लिए उसके सिवा कोई विकल्प नहीं बचा था?

दादा बताते थे कि उनके बचपन में रेलवे स्टेशन पर “लिप्टन चाय” वाले स्टाल लगा कर हर आने जाने वाले यात्रियों को मुफ्त चाय पिलाते थे ताकि लोगों में चाय कि आदत डाली जा सके…..पहले चाय के बिना भी लोग जीते थे और लोगों को पता भी नहीं था चाय के बारे में.. मगर फिर प्रचार इतना तगड़ा हुवा कि लोगों को चाय की आदत डाल दी गयी.. उसके पहले चाय के पेड़ महज़ जंगली झाड़ियाँ हुवा करते थे.. अब वो क़ीमती हैं।

पसंद ऐसे बनायी जाती है….जिन्हें लगता है कि मोदी को उन्होंने जान और समझ के चुना है और वो जान समझ कर उनके अंध समर्थक बने हैं, ये वही लोग हैं जो समझते हैं कि चाय से लेकर अपना धर्म तक सब उन्होंने अपनी समझ से चुना है.. चाय पीने वालों से चाय के गुण पूछ लीजिये वो जाने कितने गुण बता देंगे.. धार्मिक लोगों से उनके धर्म की विशेषता पूछ लीजिये.. इतनी बता देंगे कि आप कंफ्यूज हो जायेंगे.. ये सब उन्होंने चुना नहीं था.. बस प्रचार था आसपास तो वो उसे मान गए.. मगर गुण ऐसे बताएँगे जैसे इन्होने ही चाय का आविष्कार किया था

पेप्सी, कोका कोला आप ये जानते हुवे भी आराम से पीते हैं कि ये आपकी सेहत के लिए कितना ज्यादा नुकसानदायक होता है.. क्यूँ पीते हैं आप? दिन रात पेप्सी अपना प्रचार करती है इसलिए ताकि आपके अवचेतन में वो छा जाए और आप जानते हुये कि ये ज़हर है, उसे आराम से पीते हैं। जाने कितने प्राकृतिक ड्रिंक बनाने वाली कंपनी अपना ड्रिंक लेकर मार्किट में आई जो कि आपकी सेहत के लिए बहुत अच्छा था मगर कोई भी पेप्सी को मात न दे सका क्योंकि पेप्सी अपनी आय का सत्तर प्रतिशत सिर्फ़ अपने प्रचार पर खर्च कर देता है और दिन रात आपको ये बताता है पेप्सी आपके लिए कितना लाभदायक है.. शाहरुख़ खान से लेकर अमिताभ बच्चन तक आपको आ कर समझाते हैं कि आपको पेप्सी क्यूँ पीनी चाहिए.. वो भी जानते हैं कि इसमें ऐसा कुछ नहीं है।

जब मोदी का प्रचार शुरू हुवा तो भारत के दूर दराज़ के लोगों को मोदी का नाम भी नहीं पता था.. घर घर आरएसएस के वर्कर गए लोगों को मोदी नाम की चाय पिलाने, ताकि लत लग सके.. उस चाय में धर्म का तडका लगा दिया तो जो शंका थी लोगों की वो वैसे ही उठने से पहले बंद हो गयी.. ये पूरी तरह से प्रचार था और कुछ नहीं.. क्या आपको पता है कि मोदी दस पत्रकारों के सामने ओपन प्रेस कांफ्रेस भी नहीं कर सकते हैं? कॉन्फिडेंस का ये लेवल है उनके.. उनको सब कुछ थाली में परोस के दिया जाता है.. पत्रकार भी उनकी मर्ज़ी का, सवाल भी उनकी मर्ज़ी का.. और प्रचार में उनको “शेर” बोला जाता है और आप शेर मान लेते हैं.. ये रात दिन पैतालीस टीवी चैनल “शेर” “शेर” बोलकर आपके अवचेतन में उनको “शेर” बना देते हैं जबकि वह शेर तो क्या एक सामान्य जानवर की भांति सड़क पर खुले नहीं घूम सकते डर के कारण। मोदी या ज्यादातर वीवीआईपी सड़क पर निर्भय होकर निकलें तो कोई भी इनका कबीरनगर वाला बघेल विधायक (जिसे हाल ही में जूतों से पीटा गया)बनाकर चलता बने। तो मोदी कोई शेर वेर नहीं अपितु सामान्य नागरिक से भी ज्यादा कमजोर आदमी हैं किन्तु उनके भगत उनसे लाभ के इच्छुक शैतान उन्हें अब भी आपके सामने मसीहा बनाकर प्रस्तुत कर रहे हैं।

गावों में तो कोई जानता भी नहीं था कि मोदी साहब हैं कौन आखिर.. और दक्षिणपंथी संगठनों ने अपनी जान झौंक दी इनके प्रचार के लिए.. और ये प्रचार इतना अधिक आक्रामक था कि उस समय जो मोदी को माने, वो ठीक, जो न माने उसे डरा और धमका कर मनवाया गया.. ख़ूब गाली गलौज की गयी सोशल मीडिया पर.. बड़ा ही आक्रामक प्रचार था ये.. और वो प्रचार अभी तक थमा नहीं है बल्कि दस गुना बढ़ चुका है

अब पैतालीस चैनल दिन रात आपको मोदी की खूबियाँ बताया करते हैं.. जैसे पेप्सी आपको बताता है कि पेप्सी आपको क्यूँ पीनी चाहिए.. पेप्सी कभी नहीं बताता है कि इसको पीने से आप सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना नुक्सान करते हैं और कुछ नहीं.. दक्षिणपंथ जानता है कि देश का कितना नुक्सान हो रहा है.. मगर उसे अपना प्रोडक्ट बेचना है और उसका लक्ष्य कुछ और है.. और मोदी जैसे प्रोडक्ट को फिर से खडा करना आगे उनके लिए बहुत मुश्किल होगा.. इसलिए इन्हें ही वो भुनाएंगे तब तक जब तक जनता ही न नकार दे।

ध्यान से सोचिये कि क्या अचीवमेंट था मोदी का आखिर?? कुछ नहीं.. न विज्ञान, न कला, न दर्शन न किसी भी क्षेत्र में कोई उप्लब्धि. यहाँ तक कि कोई उनको कभी भी बहुत मंझा हुवा राजनेता तक नहीं कहता था.. न ही किसी ऊंचे संस्थान की पढ़ाई और न कोई डिग्री.. मगर प्रचार ऐसा कि मेरे अपने दोस्त, जो कि ऊँचें संस्थानों में पढ़ें हैं, प्रचार से सम्मोहित हो कर बिना किसी समझ और तर्क के “उनके मन की बात सुनते” थे किसी प्रवचन की तरह।

तो अब जब कोई पूछे कि मोदी का विकल्प क्या है तो उसको कहिये जैसे सर्फ मतलब वाशिंग पाउडर नहीं होता है कोलगेट मतलब टूथपेस्ट नहीं होता है वैसे ही मोदी मतलब नेता नहीं होता है.. बस प्रचार की बात है.. जिस दिन तीस पैतीस-पैतालीस चैनल एक साथ मिलकर “चौकीदार ही चोर है” करने लगेंगे वैसे ही आपके अवचेतन में विकल्प बन जायेगा और आप मोदी की जगह अपने आस पास रहने वाले किसी भी साधारण से दिखने वाले मजदूर को मोदी जैसों से हजार गुणा बेहतर राजनेता मान लेंगे।

तो अब जब आपको ये लगे कि “प्रधानमंत्री” मतलब “नरेंद्र मोदी” ही है, तो जान लीजिए कि यह आपका भरम है भारत में मोदी से कहीं ज्यादा महान ईमानदार निडर देशभक्त लोग आपके आस पास ही मौजूद हैं जिन्हें आप झूठे प्रचार के कारण देख नहीं पा रहे।। उसी तरह जैसे आपको चाहिए तो वाशिंग पाउडर मगर प्रचार की वजह से आपके अवचेतन में “सर्फ मतलब वाशिंग पाउडर” छप गया है.. तो बस कुछ महीने इनके ख़रीदे हुवे टीवी और अख़बार से सन्यास ले लीजिए फिर जब दिमाग ठंडा हो जाए तब आराम से बैठकर सोचियेगा कि किस तरह के “प्रचारित” बेबकूफ़ी भरे विकल्प की आप बात कर रहे थे?

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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