उत्तर प्रदेश

“M-Y”अबकी बार विधान सभा चुनाव में इसे बिखरने से बचाना समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती

   सैय्यद मौहम्मद मरगूब हुसैन ज़ैदी ( प्रबन्ध संपादक) यादव-मुस्लिम’ समाजवादी पार्टी का बेस वोट बैंक माना जाता है। अबकी बार विधान सभा चुनाव में इसे बिखरने से बचाना पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती है। भले ही एसपी परिवार के झगड़े का ‘पटाक्षेप’ हो गया हो, लेकिन तब से असंतुष्टों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इनमें बड़ी संख्या में यादव और मुसलमान नेता हैं। अंसारी परिवार और अंबिका चौधरी सहित कई यादव नेताओं को साथ लेकर एसपी के इस बिखराव को और हवा दे रही हैं।

कौमी एकता दल को साथ ले माया ने लगाई सेंध
दरअसल, एसपी परिवार में झगड़े की शुरुआत ही कौमी एकता दल के विलय से शुरू हुई थी। शिवपाल सिंह यादव की पहल पर दल का विलय भी एसपी में कर लिया गया था। उससे अखिलेश नाराज हो गए थे और बाद में यह विलय खत्म हो गया। उसके बाद भी परिवार में झगड़े का सिलसिला चलता रहा। मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के बीच रिश्ते बनते बिगड़ते रहे। झगड़ा शांत होने के बाद भी मुख्तार और उनके भाई को एसपी से टिकट की उम्मीद थी, लेकिन हाल ही में गठबंधन के बाद जब टिकट नहीं मिला तो पूरा परिवार बीएसपी में शामिल हो गया। मुख्तार अंसारी परिवार को पूर्वांचल की 10 से ज्यादा सीटों पर प्रभावित करता आया है। इसी को ध्यान में रखते हुए और मुसलमानों को अपने पक्ष में करने के लिए मायावती ने कौमी एकता दल का विलय बीएसपी में करवाया है और परिवार के तीन सदस्यों को टिकट भी दिए हैं।

अखिलेश से नाराज यादव नेता भी बीएसपी के पाले में

शिवपाल सिंह यादव एसपी में किनारे कर दिए गए हैं। उन्हें एक सीट जसवंत नगर तक सीमित कर दिया गया है। उनके कई करीबियों को एसपी ने टिकट नहीं दिया है। यहां तक कि मुलायम सिंह यादव के कई करीबियों के भी टिकट काट दिए गए। यही वजह है कि मुलायम सिंह और शिवपाल के करीबियों के अखिलेश के प्रति नाराजगी को भी भुनाने की कोशिश मायावती कर रही हैं। साथ ही मुसलमानों के साथ यादव वोटरों में बिखराव कर अखिलेश को कमजोर करने की कोशिश बीएसपी कर रही है।

इसी कड़ी में पूर्वांचल के ही बड़े यादव नेता और एसपी के संस्थापक सदस्य रहे अंबिका चौधरी को मायावती ने बीएसपी में शामिल किया। वहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज सभाजीत यादव को भी पार्टी में लिया। दोनों, अखिलेश से खफा हैं। अंबिका चौधरी ने कहा कि एक पिता और राष्ट्रीय अध्यक्ष के खिलाफ अखिलेश ने जो व्यवहार किया है, वह दु:खद है। वहीं, सभाजीत यादव ने कहा कि वर्तमान एसपी सरकार में ओबीसी तो क्या एक जाति के लिए भी कुछ नहीं किया। यादवों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि सिर्फ तीन जिलों में ही इस जाति को कुछ मिला है।

पश्चिम में भी मुश्किलें
पश्चिमी यूपी में भी विधान परिषद के सभापति रमेश यादव के बेटे आशीष यादव ने भी लोकदल से नामांकन किया है। आशीष यादव भी शिवपाल यादव के करीबी माने जाते हैं। वहीं लोकदल के अध्यक्ष सुनील सिंह इन दिनों मुलायम सिंह यादव के काफी करीब रहे हैं। उधर लोकदल और फिल्म स्टार राजपाल यादव की सर्व समभाव पार्टी का एक मंच पर आना भी एसपी के यादव वोटों को नुकसान पहुंचा सकता है।

कई और बीएसपी के टच में
यादव और मुसलमान वोटरों को अपनी ओर करने के लिए एसपी के कई असंतुष्टों पर बीएसपी की नजर है। कई मुसलमान और यादव नेता हैं, जिन्हें एसपी ने टिकट नहीं दिया। उनके बीएसपी में शामिल होने की चर्चा है। जल्द ही कुछ नेता एसपी छोड़कर बीएसपी और अन्य दलों में जा सकते हैं।

मुसलमान यूथ पर भी नजर
मुसलमान यूथ को अपने साथ जोड़ने के लिए भी बीएसपी रणनीति तैयार कर रही है। इसकी कमान भी यूथ नेताओं को ही दी जा रही है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बेटे अफजाल सिद्दीकी को पश्चिमी यूपी में युवाओं को जोड़ने का जिम्मा दिया है। लोकसभा चुनाव में भी उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह जिम्मा दिया गया था। भले ही बीएसपी को लोकसभा चुनाव में ज्यादा सफलता हासिल नहीं हुई लेकिन सूत्रों का कहना है कि अफजाल की संगठन क्षमता से मायावती काफी प्रभावित हुई थीं। वहीं अब मुख्तार अंसारी, उनके भाई सिगबतुल्लाह अंसारी के साथ उनके बेटे अब्बास अंसारी को भी पार्टी में आने की साथ ही टिकट दे दिया है। वह घोसी से चुनाव लड़ेंगे। सूत्रों का कहना है कि उन्हें पूर्वांचल में युवा मुसलमानों को संगठित करने का जिम्मा दिया जाएगा।

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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17 Comments

  1. Zaidi Sahab, Aap ki tehreer qabil-e-qadr h aur ess intakhabi mahool k Pesh-nazar toh bahut hi gazab h. Ess k alawa Aap k newspaper mayy sachchaee se aashnaee h

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