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जुबैदा फिल्म के ऑफर से घबरा गई थीं करिश्मा कपूर, नहीं बनना चाहती थीं रेखा की सौतन

Karisma Kapoor Facts: 90 के दशक की पॉपुलर एक्ट्रेस करिश्मा वैसे तो कई फिल्मों में नजर आईं, लेकिन जुबैदा उनके करियर की बेहतरीन फिल्मों में से एक मानी जाती है. पर आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि इस फिल्म को करने से पहले करिश्मा कपूर बहुत डरी हुई थीं. करिश्मा के घबराने की वजह भी एक नहीं बल्कि दो-दो थीं. जुबैदा में करिश्मा के अलावा रेखा और मनोज बाजपेयी मुख्य भूमिका में नजर आए थे. मनोज महाराज हनवंत सिंह तो करिश्मा उनकी पत्नी के रोल में थीं. फिल्ममेकर श्याम बेनेगल ने जब करिश्मा को यह रोल ऑफर किया तो पहले वे घबरा गई थीं.

इस वजह से घबरा गई थीं करिश्मा 
फिल्म में करिश्मा को जुबैदा बेगम का रोल ऑफर किया गया था, जिसे करने से वे हिचकिचा रही थीं. जब फिल्म की शूटिंग शुरू हुई तो फिल्म की दोनों एक्ट्रेस को एक खास वजह से चेतावनी भी दी गई. इसके पीछे एक खास वजह थी. दरअसल, पहले जुबैदा बेगम का रोल मनीषा कोइराला को ऑफर किया गया था, लेकिन रेखा जैसी दमदार एक्ट्रेस को वे अपनी सौतन के रोल में देख नहीं पा रही थीं. इस वजह से उन्होंने फिल्म करने से इनकार कर दिया. जब इस रोल के लिए करिश्मा को अप्रोच किया गया तो वे भी इसी वजह से घबराने लगीं. 

बच्चों की तरह किया ट्रीट 
करिश्मा कपूर रेखा की वजह से तो घबराई ही थीं, साथ ही उनके डर की एक और वजह थी. करिश्मा ने इतना सीरियस रोल पहले कभी नहीं किया था. एक्ट्रेस ने बताया था कि वे खुद को इस रोल के लिए तैयार नहीं कर पा रही थीं. इस वजह से उन्होंने फिल्म साइन करने में काफी समय ले लिया था. जब सेट पर रेखा करिश्मा को बच्चों की तरह ट्रीट करने लगीं, तब जाकर उनकी घबराहट दूर हुई. रेडिफ को दिए एक इंटरव्यू में करिश्मा ने कहा था, “रेखा जी के साथ काम करना अमेजिंग था. वह मुझे बचपन से जानती थीं. फिल्म में भी एक बच्चे की तरह ही ट्रीट किया था”.

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Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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