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मैं तो सवाल करूँगा..समझ सकें तो समझें.. लिंचिंग हिन्दू की हो चाहे मुसलमान की,स्वामी की हो या पहलू खान की,,

लेख द्वारा मोहम्मद आरिफ खान

मैं तो सवाल करूँगा..समझ सकें तो समझें..
लिंचिंग हिन्दू की हो चाहे मुसलमान की,स्वामी की हो या पहलू खान की,,
दर्दनाक है शर्मनाक है,एक बदनुमा दाग है इस देश पर,,
#माब लिंचिंग- एक उन्मादी भीड़ जिसका लक्ष्य सिर्फ एक!
हम जब इस तरह के वीडियो देखते हैं तो रूह काप जाती हैं मन में बहुत सारे प्रश्न आते हैं कौन था? किसने किसको मारा? क्या गलती थी? फिर अपनी सहूलियत के हिसाब से मीडिया कहानी बताएगी और फिर मामला ठंडा होकर एक किताब बनकर बस्ते में रखा जाएगा । एक नयी लिंचिग का इंतजार किया जाएगा।
देखिए मनोवैज्ञानिक रूप से देखे तो ऐसी स्थिति में भीड़ का एक ही दिमाग हो जाता हैं मतलब वो सारे लोग एक ही जैसा सोचते है और उन्हें ये भी लगता है कि वो जो कुछ कर रहे है बिल्कुल सही है गर्व महसूस करते है।
लिंचिंग में अफवाह, उत्प्रेरण और भीड़ को भड़काने का काम करती हैं और आप ध्यान से देखिएगा कि भीड़ के पिछली लाइन के लोग मारने वाले मुख्य लोगो का उत्साह केसे बढ़ाते हैं
साधुओं की हत्या अत्यधिक वीभत्स रूप से की गई मै भी आपकी तरह वीडियो पूरा नहीं देख पाया। कैसे वो वृद्ध संत पुलिसवाले के आसपास जीवन बचाने की गुहार लगा रहा था। पुलिस से कोई मदद नहीं मिली। लेकिन वास्तविक कारण क्या थे ये पता नहीं। ये जांच का विषय है। सभी कठोर सजा के पात्र है
ये अफवाहों पर टिकी अशिक्षित, अधार्मिक और असंतुष्ट लोगो की उन्मादी भीड़ शायद उस न्यायतंत्र की विफलता का प्रतीक है जो देर से मिले न्याय को भी न्याय कहती है वो सरकारी सिस्टम जिसे कोई दिलचस्पी नहीं है कि आपके साथ न्याय हो। और ये भीड़ फैसला खुद करना चाहती हैं
ऐसी घटना के वीडियो आते रहेंगे जिसे हम देखकर मन दुखी कर लेगे। अपनी सहूलियत के हिसाब से उसे रंग देगे, आक्रोश व्यक्त कर लेगे, वॉट्सएप की डीपी बदल देंगे और 4 दिन बाद मूव ऑन।
अपने चश्मे उतारिए और अलग एंगल को अलग रखिए किसी भी चीज को जस्टिफाई मत कीजिए। ये मान लीजिए हर तरह की माब लिंचिंग मानवता और समाज पर कलंक हैं ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति नही होनी चाहिए। किसी की बहुत बड़ी गलती भी हो तो भी यह भीड़ तरीका सही नहीं हो सकता।
जब-जब मोब्लिंचिंग की बात होती है मैं इंस्पेक्टर सुबोध सिंह को भूल नही पाता हूँ।अभी तक हमारे देश मे मोब्लिंचिंग की 129 घटनाये हो चुकी है,और जिस तरीके से इंस्पेक्टर सुबोध सिंह के हत्यारों को फूल मालाओं से स्वागत किया गया था,शायद आप लोगो को याद होगा। इतनी दर्दनाक घटना के अभियुक्त को इस तरीके से स्वागत करना बेहद निंदनीय था….?????
अगर सरकार इस तरीके की घटनाओं पर पहले ध्यान दी होती तो शायद पालघर की ये घटना न होती।
जिस समय हमारे देश की 49 हस्तियों ने पत्र लिखा था उस समय सरकार मोब्लिंचिंग की घटनाओं को संज्ञान लिया होता,क्या सरकार से सवाल पूछना जघन्य अपराध है क्या…?? उन 49 हस्तियों के खिलाफ FIR न किया होता तो आज देश में ऐसी घटनाएं न सुनने को मिलती।।
पालघर की घटना की मैं पूरी तरीके से कड़ी नींदा करता हूँ और सरकार से मांग करता हूं कि मोब्लिंचिंग पर बहुत ही शक्त कानून बने,जिससे इस तरीके की घटना अब भविष्य में न हो।

Mohd Arif Khan.
PhD Research Scholar,
Department of Political Science, IGNOU, New Delhi.

 

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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