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शांतिकुंज आश्रम के प्रमुख डॉ. प्रणव पांड्या पर रेप का आरोप, एफआईआर दर्ज

राजेश तिवारी विशेष संवाददाता (SBT24.TV)
शांति कुंज आश्रम हरिद्वार के प्रमुख डॉ. प्रणव पांड्या पर रेप की जीरो एफआईआर विवेक विहार थाने में दर्ज की गई है। इस मामले में उनकी पत्नी भी नामजद है। बता दें कि पांड्या पर छत्तीसगढ़ की रहने वाली एक लड़की ने रेप का आरोप लगाया है ।
उधर, दिल्ली में दर्ज यौन शोषण की जीरो एफआईआर पर प्रणव पंड्या का कहना है कि यह उनके खिलाफ एक साजिश का हिस्सा है। जिस व्यक्ति ने यह शिकायत की है वह उनके अनुसार शांतिकुंज में रहता है और अपनी पत्नी को भी उनके खिलाफ इस्तेमाल कर ब्लैकमेल करता रहता है।
उन्होंने कहा कि वह 17 मई को लॉकडाउन समाप्त होने के बाद उस व्यक्ति को शांतिकुज से निकालने का मन बना रहे हैं । उनका कहना है कि लॉकडाउन के दौरान निकालना उचित नहीं है। उनका कहना है कि दिल्ली में उनके खिलाफ दर्ज मामले को वह कानूनी ढंग से लड़ाई लडेंगे।

आश्रम में काम करते समय रेप का आरोप
वहीं पुलिस स्टेशन में जो बयान दर्ज कराया गया है उसके अनुसार पीडिता ने कहा है कि साल 2010 में जब वह 14 साल की थी, तो 16 मार्च 2010 को गांव के एक व्यक्ति के संग हरिद्वार पहुंची थी। जहां शांतिकुंज गायत्री परिवार में अच्छा भोजन, पढ़ाई, साधन और शादी का बहाना देकर चौकी में भोजन व्यवस्था का काम दिलाया गया था। 21 मार्च 2010 से उसे भोजन और प्रसाद बनाने के लिए रखा गया।
पीड़िता का कहना है कि जुलाई 2010 को प्रणव को कॉफी देने कमरे में गई थी। आरोप के मुताबिक उसी दौरान उस पीड़िता के साथ रेप किया गया। पीड़िता का कहना है कि इस घटना के एक सप्ताह बाद फिर उसके साथ दो बार रेप किया गया और जान से मारने की धमकी दी गई और चुप रहने के लिए कहा गया। जिसके बाद पीड़िता ने अब रिपोर्ट दर्ज कराई है।

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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