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शाहरुख को अपना बेटा मानते थे दिलीप कुमार, ‘ट्रेजेडी किंग’ की 100वें जन्मदिन पर जानें ये किस्सा

Dilip Kumar 100th Birth Anniversary: अपनी दमदार एक्टिंग के दम पर हिंदी सिनेमा को नई ऊंचाईयों तक पहुंचाने वाले अभिनेता दिलीप कुमार (Dilip Kumar) साहब बेशक इस दुनिया में नहीं रहे. लेकिन अपनी फिल्मों की वजह से आज भी उनका नाम फिल्मी दुनिया में सुनहरों अक्षरों में लिखा जाता है. 11 दिसंबर 1922 वो दिन था, जब यूसुफ खान यानी दिलीप कुमार का जन्म पाकिस्तान के पेशावर में हुआ था. ऐसे में आज दिवंगत एक्टर दिलीप कुमार की 100वीं बर्थ एनिवर्सरी है. ऐसे में हम आपको दिलीप कुमार और सुपरस्टार शाहरुख खान (Shah Rukh Khan) के रिश्ते के बारे में बताने जा रहे हैं.

दिलीप कुमार से खास था शाहरुख का रिश्ता

दिलीप कुमार और शाहरुख खान हिंदी सिनेमा के दो ऐसे कलाकार हैं, जिनके पास सबसे ज्यादा 8 फिल्मफेयर अवॉर्ड को अपने नाम करने का रिकॉर्ड दर्ज है. इतना ही नहीं दिलीप की ब्लॉकबस्टर फिल्म देवदास का रीमेक हिट करा के शाहरुख ने साबित कर दिया है कि वह भी ट्रेजेडी किंग की तरह दमदार एक्टर हैं. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक शाहरुख खान के पिता ताज मोहम्मद खान और दिलीप कुमार का जन्म और पालन पोषण पाकिस्तान के पेशावर में हुआ. साल 2013 के फिल्मफेयर अवॉर्ड्स के दौरान शाहरुख खान ने कहा था कि ‘दिलीप साहब और मेरा रिश्ता फिल्मों से परे हैं, उन्होंने और सायरा जी ने हमेशा से मुझे अपना बेटा माना है.’

शाहरुख जैसा होता हमारा बेटा- सायरा

मुंबई मिरर को दिए एक इंटरव्यू में दिलीप कुमार (Dilip Kumar) की वाइफ और एक्ट्रेस सायरा बानो (Saira Banu) ने एक रोचक किस्सा बताया. दरअसल सायरा ने कहा- ‘हमारी कोई संतान नहीं थी. लेकिन हम जब भी शाहरुख खान (Shah Rukh Khan) से मिलते तो हमें ऐसा लगता था कि अगर हमारा कोई बेटा होता तो वह शाहरुख की तरह ही दिखता. शाहरुख और दिलीप साहब के बाल एक जैसे थे. ऐसे में मैं जब भी शाहरुख से मिलती तो उनके बालों में हाथ फेरा करती थी.’ बता दें कि 7 जुलाई 2021 को दिलीप कुमार का निधन हो गया था.

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Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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