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अस्पताल आरक्षण मामला में दिल्ली हाईकोर्ट ने दिया केजरीवाल सरकार को झटका!

दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल (जीटीबी अस्पताल) में मरीजों के इलाज में आरक्षण के मसले पर दिल्ली हाईकोर्ट ने अरविंद केजरीवाल सरकार को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने कहा है कि जीटीबी अस्पताल में इलाज के लिए दिल्ली के निवासियों को 80 फीसदी आरक्षण देना गलत है और साथ ही यह भी कहा है कि पुरानी व्यवस्था बरकार रहेगी यानी कोई आरक्षण का नियम लागू नहीं होगा।

वहीं, इसकी वजह से दिल्ली के अन्य सरकारी अस्पतालों और डॉक्टरों को भी राहत मिली है। दरअसल, दिल्ली सरकार ने 15 से 30 सितंबर तक पूर्वी दिल्ली के एम्स कहे जाने वाले गुरु तेग बहादुर अस्पताल (जीटीबी) में राजधानी के लोगों के लिए 80 फीसदी बिस्तर आरक्षित किए थे। साथ ही ओपीडी में दिल्ली का आधार और वोटर कार्ड दिखाना अनिवार्य किया था। 15 दिन तक चले इस पायलट प्रोजेक्ट को 1 अक्तूबर से तीन माह के लिए आगे बढ़ा दिया।

1515 बिस्तरों वाले इस अस्पताल की ओपीडी में कुल 17 काउंटर हैं, जिनमें चार बाहरी राज्यों के मरीजों के लिए रखे गए हैं। इस कारण चार काउंटरों पर मरीजों की लंबी कतारें लगने लगीं। उन्हें नि:शुल्क दवा और जाँच की सुविधा भी अस्पताल में नहीं मिल रही थी। जिससे नजदीक स्थित स्वामी दयानंद अस्पताल, लाल बहादुर शास्त्री और ताहिरपुर सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में मरीजों की संख्या बढ़ने लगी। देखते ही देखते इन अस्पतालों में ओपीडी दोगुनी हो गई।

स्वामी दयानंद अस्पताल में आम दिनों में ओपीडी करीब 2 हजार मरीजों की होती थी, लेकिन अस्पताल के अनुसार पायलट प्रोजेक्ट के कारण चार हजार मरीज उनके यहां आने लगे। दिल्ली सरकार की पायलट योजना के तहत जीटीबी अस्पताल में ओपीडी और आपातकालीन सेवाएं सभी मरीजों के लिए रहेंगी। दिल्ली से बाहर के मरीजों को अस्पताल में निशुल्क दवा और जांच की सुविधा नहीं मिलेगी।

केवल 20 फीसदी बिस्तरों पर ही दिल्ली से बाहर के मरीजों को जगह मिल सकेगी। ओपीडी में आने पर मरीज को पहले दिल्ली का आधार और वोटर कार्ड दोनों दिखाना होगा। अगर एक पहचान कार्ड नहीं है तो मरीज को बाहरी यानि हल्के नीले रंग का ओपीडी कार्ड दिया जाएगा ताकि डॉक्टर से लेकर अन्य कर्मचारियों तक सभी को मरीज के बाहरी राज्य के होने का पता चल सके।

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