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अमरनाथ अटैकः ड्राइवर सलीम ने ऐसे बचाए बस में सवार बाकी यात्री

अमरनाथ यात्रियों से भरी जिस बस पर सोमवार को आतंकियों ने हमला किया, उसके ड्राइवर सलीम की बहादुरी के चर्चे अब हर जगह हैं। हमले के बाद सलीम ने दिलेरी और जांबाजी दिखाते हुए तब तक बस को चलाना जारी रखा, जब तक बस आतंकियों की पहुंच से दूर नहीं हो गई।

सलीम की इस दिलेरी को यात्रियों के साथ गुजरात के सीएम विजय रूपानी ने भी सलाम किया। सूरत एयरपोर्ट पर हमले में मारे गए गुजरात के 5 यात्रियों को श्रद्धांजलि देने के बाद रूपानी ने कहा कि ड्राइवर ने जिस तरह दो किलोमीटर तक बिना रुके बस चलाकर आतंकियों की पहुंच से दूर निकाला, इसके लिए वह उन्हें धन्यवाद देते हैं। बता दें कि इस आतंकी हमले में कुल 7 यात्रियों की मौत हो गई थी, जबकि 30 से ज्यादा घायल हो गए थे।

सलीम ने हमले को याद करते हुए कहा, ‘आठ बजे के पास सामने से फायरिंग हुई। फायरिंग हद से ज्यादा हो रही थी। मैं गाड़ी चलाता रहा। मैं झुका, तो पास वाले साथी को गोली लगी।’ उन्होंने कहा,’लगातार फायरिंग हुई। मैं इसलिए रुका नहीं और बस चलाता रहा।’ सलीम ने कहा कि उस वक्त खुदा ने मुझे आगे बढ़ते रहने की हिम्मत दी और मैं रुका नहीं।

हादसे में बचे कुछ यात्रियों ने बताया कि बस ड्राइवर ने सूझ-बूझ दिखाते हुए मौके से बस को किसी तरह भगाकर सुरक्षाबल के कैंप तक पहुंचाया। उनके मुताबिक अगर आतंकी बस में सवार होने में कामयाब हो जाते तो जानमाल का बड़ा नुकसान हो सकता था।

 गुजरात के रजिस्ट्रेशन नंबर GJ09Z 9976 वाली बस अमरनाथ श्राइन बोर्ड में रजिस्टर नहीं थी। एक टॉप सुरक्षा अधिकारी ने नाम न छापे जाने की शर्त पर न्यूज एजेंसी पीटीआई से बताया कि इसमें सवार लोगों ने अपनी यात्रा दो दिन पहले ही पूरी कर ली थी और इसके बाद से वे श्रीनगर में ही थे।

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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