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रोकी नहीं तो आतंकवाद में बदल जाएगी धार्मिक कट्टरता, कुछ एनजीओ भी हैं एजेंट: राजनाथ सिंह

केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार (16 मई) को एक कार्यक्रम कहा कि अगर धार्मिक कट्टरता को वक्त रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो ये “आतंकवाद में बदल सकता है।” राजनाथ सिंह ने कहा कि ये भी संभव है कि कट्टपंथ के कुछ “एजेंट” “एनजीओ के नाम पर काम कर रहे हों।” राजनाथ सिंह ने कहा कि कुछ “एजेंट” को “विदेशी चंदा” भी मिलता है इसलिए “विदेशी चंदे पर नजर रखना जरूरी है।”

राजनाथ सिंह पूर्वोत्तर भारत के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (डीजीपी) की सुरक्षा समीक्षा बैठक में बोल रहे थे। सिंह ने कहा कि समाज में कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाले तत्वों की पहचान जरूरी है क्योंकि ये क्षेत्र संवेदनशील है। सिंह ने लिखा, “इनमें से कुछ एजेंट धर्म के नाम पर, वहीं कुछ एनजीओ के नाम पर या विकास कार्यक्रमों, सामाजिक-सांस्कृतिक उत्थान और शैक्षणिक कार्यक्रमों के चोले में काम कर रहे हैं।” सिंह के अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल एवं अन्य अधिकारी भी बैठक में शामिल थे।

सिंह ने कहा, “अगर हम भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों की बात करें तो कट्टरता एक बड़ी सुरक्षा चुनौती के रूप में सामने आ रही है। कट्टरता एक अंतरदेशीय परिकल्पना है।” सिंह ने पूर्वोत्तर भारत में हथियारों की तस्करी पर चिंता जाहिर करते हुए पुलिस अधिकारियों से इस पर रोकथाम के लिए विशेष अभियान चलाने के लिए कहा।

राजनाथ  सिंह ने कहा कि लगभग पूरा पूर्वोत्तर उग्रवाद से मुक्त हो चुका है लेकिन हथियारों की तस्कीर रोकनी जरूरी है। सिंह ने कहा, “इतनी बड़ी संख्या में अवैध हथियारों की तस्करी से अपराध बढ़ते हैं। मैं सभी डीजीपी से आग्रह करूंगा कि वो इसके खिलाफ विशेष अभियान चलाएं।” सिंह ने कहा कि पूर्वोत्तर की अंतरराष्ट्रीय सीमा से हथियारों के अलावा नशे का सामान और जाली नोट की भी तस्करी हो रही है। सिंह ने कहा कि पूर्वोत्तर में सीमा पर पुलिस चौकियों को बढ़ाने की जरूरत है। सिंह ने कहा कि पिछले कुछ सालों में पूर्वोत्तर की स्थिति बेहतर हुई है।

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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