विशेष पोस्ट

कोविड-19 के संक्रमण के दृष्टिगत कारागारों में भीड़ कम करने के दृष्टिगत बन्दियों को अन्तरिम जमानत व पैरोल पर छोड़े जाने के क्रम में आज तक 179 बंदी जमानत एवं पैरोल पर रिहा किया

शहजाद अहमद रिहान उप संपादक: कोविड-19 के संक्रमण के दृष्टिगत कारागारों में भीड़ कम करने के दृष्टिगत बन्दियों को अन्तरिम जमानत व पैरोल पर छोड़े जाने के क्रम में आज तक 179 बंदी जमानत एवं पैरोल पर रिहा-जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, विमल त्रिपाठी

सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, विमल त्रिपाठी ने जानकारी देते हुए बताया कि माननीय उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण लखनऊ व माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कोविड-19 के संक्रमण के दृष्टिगत रिट संख्या- 1/2020 IN RE : CONTAGION OF COVID-19 IN PRISONS के अनुपालन में कारागारों में भीड़ कम करने के दृष्टिगत बन्दियों को अन्तरिम जमानत व पैरोल पर छोड़े जाने के लिए कारागारों में ऐसे समस्त विचाराधीन बन्दी जो इस प्रकार के अपराधों में निरूद्ध है, जिसमें अपराध की अधिकतम सजा 07 वर्ष तक की प्राविधानित है, को 08 सप्ताह की अन्तरिम जमानत पर निजी मुचलका पाबंद करते हुए तत्काल कारागार से मुक्त कर दिया जाने एवं ऐसे सिद्धदोष बन्दियों को जिन्हें 07 वर्ष अथवा उससे कम की सजा से दण्डित किया गया है, को 08 सप्ताह के लिये निजी मुचलका पाबंद हुए पैरोल पर छोड़े जाने का निर्देश प्राप्त हुए हैं। उन्होनंे बताया उक्त निर्देशों के अनुपालन में माननीय श्रीमती जयश्री आहूजा, जिला न्यायाधीश बिजनौर द्वारा गठित कोविड-19 कमेटी 28 मार्च,2020 में माननीय अपर सत्र न्यायाधीश व न्यायिक मजिस्ट्रेटों द्वारा 30 मार्च,2020 से 06 अपै्रल,2020 तक कुल चिन्हित विचाराधीन बन्दियों में से 167 विचाराधीन बन्दियों को अन्तरिम जमानत व 12 सिद्धदोष बन्दियों को पैराले पर अर्थात कुल 179 बन्दियों को रिहा किया जा चुका है।

 

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button