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बहराइच से 2019 लोकसभा प्रत्याशी शब्बीर अहमद हैं दलित, रोचक है वाल्मीकि कनेक्शन

समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनावों के लिए छह प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर दी है. सपा ने लोकसभा की अरक्षित सीट बहराइच से शब्बीर अहमद वाल्मीकि पर दांव खेला है. 2014 के लोकसभा चुनाव में शब्बीर अहमद बीजेपी की सावित्री बाई फुले से करीब 95 हजार वोटों से हार गए थे.

शब्बीर अहमद एक मुस्लिम नाम होने के बावजूद वह दलित प्रत्याशी हैं. इनकी वाल्मीकि विरादरी से होने की कहानी भी कम रोचक नहीं है. इतना ही नहीं मुस्लिम नाम के बावजूद खुद को दलित साबित करने के लिए उन्हें कानूनी लडाई भी लड़ी और उसे जीता भी.

शब्बीर अहमद बताते हैं उनके मुस्लिम नाम की शुरुआत उनके जन्म के साथ ही शुरू हुई. उन्होंने बताया, “मेरे पिता बबेरू लाल वाल्मीकि ने एक बच्चे के लिए तीन शादियां की. जिसके बाद मैं पैदा हुआ. इसके बाद मुझे बुरी आत्माओं से बचाने के लिए एक मुस्लिम दंपति को 300 रुपये में बेच दिया गया. इसके बाद उस मुस्लिम परिवार के पास मैं कुछ दिनों तक रहा और मुझे नाम दिया गया शब्बीर अहमद.

शब्बीर अहमद ने बताया कि वे उस मुस्लिम परिवार से फिर दुबारा कभी नहीं मिले. उन्हें यहां तक पता नहीं है कि वे जिन्दा भी हैं कि नहीं.शब्बीर अहमद का नाम इन्हें दलितों के साथ ही मुस्लिम मतदाताओं में भी फेमस बनाता है. शब्बीर अहमद 1993 से 2012 तक चार बार विधायक भी रहे. यही नहीं 2014 के लोकसभा चुनाव में वे दूसरे नंबर पर थे.

इस बार वे सपा बसपा गठबंधन के प्रत्याशी है. लिहाजा उनकी दावेदारी मजबूत मानी जा रही है. मौजूदा बीजेपी सांसद भी कांग्रेस का दामन थाम चुकी हैं. उम्मीद है वे कांग्रेस की तरफ से यहां मैदान में होगी. ऐसे में बीजेपी के लिए इस सीट को बचाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं होगा.

Aslam Khan

हर बड़े सफर की शुरुआत छोटे कदम से होती है। 14 फरवरी 2004 को शुरू हुआ श्रेष्ठ भारतीय टाइम्स का सफर लगातार जारी है। हम सफलता से ज्यादा सार्थकता में विश्वास करते हैं। दिनकर ने लिखा था-'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।' कबीर ने सिखाया - 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर'। इन्हें ही मूलमंत्र मानते हुए हम अपने समय में हस्तक्षेप करते हैं। सच कहने के खतरे हम उठाते हैं। उत्तरप्रदेश से लेकर दिल्ली तक में निजाम बदले मगर हमारी नीयत और सोच नहीं। हम देश, प्रदेश और दुनिया के अंतिम जन जो वंचित, उपेक्षित और शोषित है, उसकी आवाज बनने में ही अपनी सार्थकता समझते हैं। दरअसल हम सत्ता नहीं सच के साथ हैं वह सच किसी के खिलाफ ही क्यों न हो ? ✍असलम खान मुख्य संपादक

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